Tuesday, April 7, 2020

मेरी संस्कृत काव्य रचनाएं : हिमांशु गौड़



२००५-०६ में (उत्तरमध्यमा प्रथम वर्ष) मैंने एक संस्कृत गीत लिखा -

"प्राक्कालश्च हा यस्स नष्ट: कथं,
       कोऽपि नो वेत्ति वा चास्य गूढव्यथाम् "।
****

इसके बाद 2007 में "रेतश्शक्तितत्त्व" पर मैंने ७-८ श्लोक लिखे थे।

फिर 2007 में ही मैंने एक महाकाली के युद्ध का वर्णन पंचचामर छंद के श्लोकों से किया था ।

और उसके बाद (२००७-८ में ही) गदर फिल्म के नल उखाड़ने वाले सीन को मैंने संस्कृत के श्लोकों (पंचचामरछंद) में पिरोया था।



- "

2007 में ही मैंने अपने एक मित्र को संस्कृत श्लोकात्मक पत्र लिखा था । वह मित्र भागवत कथा वाचक था , और वह पत्र शार्दूल विक्रीडित छंद में था।

२००८-९-१० , मेरा व्याकरण (भाष्य,शेखर,मनोरमा,कौण्डभट्ट), वेदांत (वेदांतसार, पंचदशी, ब्रह्मसूत्र, शांकरभाष्य) सांख्य (सांख्यकारिका,सांख्यतत्वकौमुदी) और न्यायसिद्धांतमुक्तावली का अनुमान खंड (चूंकि प्रत्यक्ष खंड मध्यमा में पढ़ चुके थे) पढ़ने-पढ़ाने में ही व्यतीत हुआ , इसलिए श्लोक बनाने से विरति हो गई थी।




उस वक्त मेरी दिनचर्या कुछ अस्त-व्यस्त सी हो गई थी , जब मुझसे इस बारे में पूछा तो मैंने
2009 में जो स्वरचित पंक्ति मैंने सबसे पहले श्रीबाबा गुरु जी को सुनायी थी वह थी -

"अस्तव्यस्तसमस्तजीवनदशा केनापि न त्यज्यते"

तब श्रीबाबा गुरु जी ने उसको पूरा श्लोक बनाकर मुझे दिया था , जो अभी फिलहाल मेरे याद नहीं।





शास्त्री द्वितीय वर्ष (B.A. second year) के बाद मेरी दिनचर्या अस्त-व्यस्त हो गई , तो बाबा गुरु जी ने मेरे विषय एक श्लोक बनाया और मेरे कमरे में उस पर्चे को फेंक कर चले गए !
जब मैंने कुछ समय बाद उस पर्चे को उठाकर देखा , उसकी यह पंक्ति ही मेरे याद है -

 मन्येऽसौ युवक: प्रमादवशतोऽ....

*******
 2012 में कुछ मौका मिला , तो मैंने अनेक विषयों में उस समय श्लोक लिखे थे, जोकि असावधानी और महत्त्व न जानने के कारण सब कुछ नष्ट हुए।

"श्रीओमो व्याकुलस्तत्र जापानं यास्यते मया।
औषधिभक्षणं कृत्त्वा शतश:......"

ये उसी समय का एक श्लोक अभी याद आया।

 उसके बाद मैंने डायरी बनाकर लिखना शुरू किया।

"शिरोभेदनशतकम्" मैंने सन् 2015 के मार्च में लिखा छात्रावास में रहते हुए!

दिल्ली निर्भया कांड से मन बहुत विचलित था, मन में था इस पर कुछ लिखूंगा ।

तब "बलात्कारशतकम्" मैंने सितंबर 2015 में लिखा ,कविभास्कर छात्रावास कमरा नंबर 135 में ।

उस दिन मेरे मित्र अंकुरपांडे जी का जन्मदिन था।

 "शिरोभेदनशतकम्" मैंने दो बैठकों में लिखा था ! मतलब एक बार बैठा तो 75 श्लोक , अगले दिन १:३० घंटे के लिए बैठा तो 35 श्लोक,  इस तरह से।

जब सब लोग अंकुर पांडे जी के बर्थडे में हैप्पी बर्थडे टू यू बोल रहे थे , उस समय, मैं बैठा हुआ "बलात्कारशतकम्" लिख रहा था ।

इस शतक में बलात्कार रूपी समस्या का कारण क्या है ? और निवारण क्या है ? इसके संबंध में 100 श्लोकों में विचार किया गया है ।

 ये वही दिन थे , जब मेरी नवीन तिवारी जी के साथ नयी पहचान हो चुकी थी , और हम साथ साथ ही मोटू होटल चाय पीने जाते थे ।

 फिर मैंने उसी समय ही "भाति नो भारतम्" नामक संस्कृत काव्य भी शुरू कर दिया था। जिसके उस समय ही मैंने लगातार 35 श्लोक लिखे थे ।



मेरा सबसे महत्वपूर्ण काव्य "नरवरगाथा", - यह मैंने आश्विन नवरात्र 2014 में शुरू किया था,
इसके आदिम  "छात्रकौतुककाण्ड" की शुरुआत मैंने गजरौला में एक अपने जजमान के घर बैठकर ही शुरू की , उसके बाद अपने घर आकर "भूतकाण्ड" और "प्रकृतिकाण्ड" के कुछ श्लोक लिखे !  वैदुष्यकाण्ड के कुछ श्लोक भी लिखे!
 वर्चस्वकाण्ड के कुछ श्लोक मैंने 2017 में लिखें! जब मैंने इसकी शुरुआत की तो इसमें लगभग 14 काण्ड मैंने सोचे थे , लेकिन फिर मैंने सोचा , कांड तो खुद ही बड़े बड़े होते हैं , इसलिए इनको सिर्फ 5 काण्ड में ही रखा जाए ।




इसलिए यह पांच कांड ही इसमें प्रमुख "छात्रकौतुककाण्ड" "भूतकाण्ड" "प्रकृतिकाण्ड" "वैदुष्यकाण्ड" और "वर्चस्वकाण्ड" ।
भूतकाण्ड का श्लोक देखिए -

 "प्रेतैर्यदा नरवरस्य च पीडितस्त्वं
             रात्रौ भविष्यसि पुनर्न हसिष्यसीत्थं
 आतङ्कमीदृशमहं परिदृष्टवांश्च
          काले गते बहुतिथेपि भयं न नष्टम् ।।"

*****
"शैवीचर्चा" "विद्वद्धर्षिकाव्यम्" "जीवनशतकम्" जैसे कई काव्यों को मैं अगस्त 2015 में बिल्कुल शुरू कर चुका था ।
 "विद्वच्छतकम्" "वीरशतकम्" और "धनिकशतकम्" लिखने का विचार मैंने जुलाई 2014 में ही बना लिया था , जबकि इन तीनों शतकों के लगभग 25-25 श्लोक भी उसी समय मैंने लिख लिए थे , जो आज भी मेरी किसी पुरानी डायरी में हैं ।

"अमिताभबच्चनशतकम्" "संस्थानशतकम्" "" ये मेरे मार्च २०१५  में लिखे हुए काव्य हैं,
अमिताभबच्चनशतकम्" में उस वक्त ३५ श्लोक और "संस्थानशतकम्" में ४० श्लोक लिख कर चुप बैठ गया था।

उसके बाद अमिताभ बच्चन शतक के 20 श्लोक और भी, मैंने सन् 2016 में लिखे थे। मतलब इस तरह से अमिताभ बच्चन शतक के 60 श्लोक ही मेरे पास अभी तक है संस्थानशतक को मैंने दोबारा उससे आगे देखा ही नहीं , अभी तक वह मेरे पुराने कागजों में अभी तक दबा पड़ा हुआ है।

हां , शिवलहरी मैंने जुलाई 2015 में लिखी थी । यह मुझे अभी याद आया,  क्यों ? क्योंकि उसी समय मैंने कृतिदेव में टाइपिंग सीखी थी , और मैं अपने लैपटॉप पर बैठा हुआ जुलाई 2015 में शिव लहरी के 19 श्लोकों की टाइपिंग कर रहा था ।

 "पातालदैव्यन्धरी" नामक काव्य ग्रन्थ की कल्पना ने मेरे दिमाग में 2013 के उत्तरार्ध में जन्म लिया ।
यही नाम था शुरुआती तौर पर मेरे इस ग्रंथ का ।
2014 के नवंबर-दिसंबर में मैंने इस ग्रंथ की शुरुआत की !
और उस समय जबकि मेरी श्लोक लिखने की क्षमता कुछ भी नहीं थी उस दौर में भी मैंने 2 दिन में ५५ श्लोक लिखे,  जोकि भुजंगप्रयात, इंद्रवज्रा , उपजाति , उपेंद्रवज्रा आदि छंदों में थे , और आज भी मेरी एक बहुत पुरानी डायरी में लिखे हुए हैं ।

2015 के नवंबर महीने में इसी (दैव्यन्धर) काव्य के दो काव्य बनाने का मेरे मन में विचार उठा।
 मैंने सोचा "पातालदैव्यन्धरी" नाम कुछ बड़ा है , इसलिए "दैव्यन्धरीकथा" गद्यकाव्य और "दैव्यन्धरं काव्यम्" पद्यात्मक , यह दो तरह से मैंने विभाग किया।


 उसके बाद 2015 में ही "नरवरप्रेतीयम्" गद्यकाव्य के चार-पांच गद्यांश भी लिखें ।

यह वही समय था जब मैं "दैव्यन्धरी-कथा" के भी 5 गद्यांश लिख चुका था !
उसके बाद इस कथा के 2-3 गद्यांश मैंने 2017 में भी लिखे थे ! ओह , मैं भूल गया था  कि दिव्यन्धर काव्य को गद्य और पद्यात्मक दो विभाग करने का विचार मेरा 2015 का नहीं , बल्कि 2014 का ही था।

 क्योंकि तभी से मैं गद्य और पद्य दोनों में दिव्यन्धर के चरित्र को लिख रहा था ।

इसकी मैं थोड़ी सी कथा आपको बताता हूं।
 दिव्यन्धर, एक ब्राह्मण ! जो कि शिव का भक्त है ! तैरने में निपुण है ! शास्त्रों का व्याख्याता है और तंत्र साधना में रत रहता है!


 वह एक बार घोर जंगल में बैठा हुआ साधना कर रहा होता है,  तभी एक यक्षिणी प्रकट होकर उसे पाताल के जंगल में फेंक देती  है । जहां उसका युद्ध होता है , एक पिशाचराज से ।

उस समय जब युद्ध हो रहा होता है। उसी जंगल से कुछ दूरी पर भगवान शिव , जो कि उस समय 14 लोकों का भ्रमण करते हुए पाताल लोक में ठहरे हुए थे । उनको यह बात पता चली ।
वे राजा बलि की नगरी की तरफ पहुंचें। वहां राजा बलि ने उनका स्वागत किया। तब दिव्यन्धर को दर्शन देकर भगवान् शिव अपने भक्ति का आशीर्वाद दिया ।

 इस तरह से यह पूर्णतया काल्पनिक कथा थी ,जो अभी भी 2015 के बाद मैंने स्थगित कर दी थी, और अभी तक स्थगित है।


2016 जनवरी में "नारीशक्तिकाव्यम्" लिखने का विचार बनाया , जिसके कुछ ही शुरुआती श्लोक लिखे थे, मेरे जीवन के किसी शोध में लग जाने के कारण वह काव्य उससे आगे नहीं बढ़ पाया। उसकी प्रस्तावना और अध्याय विभाजन आज भी मेरे पास है।

 और हां , सबसे मुख्य बात मैंने जो शतक लिखने की शुरुआत की , उसमें सबसे पहले जो मैंने नाम सोचा वह "नरवरशतकम्" था , जिसके १५ श्लोक मैंने २०१३-१४ में ही लिखे थे।

फिर जब मैं राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय भोपाल परिसर में जाकर पहली बार श्री बृजभूषण ओझा गुरु जी से मिला, तो उनको श्रीओम जी ने बताया कि ये संस्कृत काव्य लिखते हैं , तो उन्होंने कहा कुछ सुनाइए !
तो मैंने "नरवरशतकम्" के कुछ श्लोक सुनाए थे। उस समय वे क्लास में बैठे हुए आचार्य के कुछ छात्रों (छात्राओं) को पढ़ा रहे थे।
*****

 एक लड़का दीपक था , जो कि क्लास में मुझसे नरवर में 3 क्लास छोटा था, लेकिन बड़ा ही साहसी , अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए तत्काल युद्ध के लिए तैयार! एवं उसके अनेक ऐसे बहुत से गुण थे , जोकि एक कवि हृदय को आकर्षित कर सकते हैं । मैंने सोचा इसके ऊपर ही एक शतक लिखा जाए!
तो अगर आप कहें कि आपने कौन से दूसरे शतक का प्रारंभ किया तो मैं कहूंगा कि "नरवरशतकम्" के बाद "दीपकशतकम्" ही मेरा दूसरा शतक था , जो कि आज भी अधूरा (४० श्लोक मात्र) है।


 तो "दीपकशतकम्" 2013 का ही काव्य है जोकि मेरी फेसबुक मेमोरी में आज भी 7 साल पहले का आ जाता है। यह भी एक तरह से "लंगड़धारीपने" का व्याख्यान सा  ही करता है। 2016 सन् मेरा कैसा गया? यह आप सोच रहे होंगे ! तो बहुत प्रकार के भाव सहित, सूक्ति आदि लिखने में यह मेरा साल व्यतीत हुआ!
 और हां , एक तो भूल ही गया सन् 2014 की ही उपज है - "कलिकामकेलि:" - इसको मैंने नरवर में ही लिखना शुरू कर दिया था।

 और इसका प्रथम अध्याय 2014 में ही लिखा जा चुका था , फिर 2015 में मैंने इसके 3 अध्याय और लिखें ।

फिर पांचवा अध्याय लिखने की सोच रखा,  लिखूं या ना लिखूं? लेकिन अब सोच रहा हूं, चार ही पर्याप्त हैं! अभी इसे ऐसे ही छपवा दूंगा थोड़े दिनों में !

मतलब "कलिकामकेलि:" मेरा 2015 का काव्य है एक तरह से।

यह 2016 की जनवरी की बात है , उस समय मैं कंप्यूटर टाइपिंग, सेटिंग आदि ज्यादा अच्छी तरह नहीं जानता था।
 या यूं कहूं कि बिल्कुल कम ही जानता था , तो भी कोई हर्ज नहीं !



मैं डॉ. अखिलेश पांडे जी के पास गया! उनके गांव के पास ही एक बहुत अच्छा शिव मंदिर था उन्हें उसी शिव मंदिर की भक्ति, आराधना संबंधी कुछ श्लोक मुझसे बनवाने थे , सो मैं उसी कार्य के लिए गया था।

 और फिर बातों-बातों में ही अपने लिखे काव्यों की चर्चा होने लगी , उन्होंने कहा - "अरे गौड़ साब! आपके इतने काव्य हैं , तो आपको तो इसी साल (जनवरी २०१६ का समय था वह) साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल जाना चाहिए!"

 पर उस समय मेरा ज़रा फक्कड़ स्वभाव था! मैं किसी चीज को भी गिनता नहीं था! इसलिए पुरस्कार, सम्मेलन , संगोष्ठी , कवि सम्मेलन , आदि पर मेरा ध्यान नहीं था ज़रा भी।

हां , एक बात और ! जो लोग सोचते हैं , मैंने सिर्फ लौकिक काव्य यह लिखे हैं , भगवान के लिए नहीं , तो उनके लिए मैं बता दूं,  कि सन् 2015-16 और 17 इन सालों में, और पहले भी,  शिव भक्ति के न जाने कितने स्तोत्र लिखे हैं !
और यह नहीं है की पुराने स्रोतों की टीपा-टापी कर दी , बल्कि शिव के लिए जो अपने हार्दिक भाव हैं वे लिखे हैं । जैसे - "शिवस्य प्रभावाद्वयं सिंहराजा:", । "असम्भवं तत्कृपया विनैतत्" "त्वमेवासि शम्भो" "बिल्वपत्रा वयम्" "केवलश्शूलपाणि:" "भीतोस्मि" इत्यादि यह सब शिव के  ही लिए कविताएं हैं।




अब अगर तंत्र की बात करें , तो दैव्यन्धर काव्य मैंने लिखा ही अपनी तांत्रिक रुचि के कारण है।

यक्षिणी साधन की विधि क्या है ? उसको कैसे स्थान पर करना चाहिए? अदृश्य करण मंत्र क्या है? उड्डीश तंत्र क्या है ? आसन सिद्धि किसे कहते हैं ? जंजीर का मंत्र क्या होता है ? 14 लोकों की विशेषताएं क्या है ? यह सब बात,  जो मैंने ज्ञान हासिल किया , उसका प्रयोग इस काव्य में आपको देखने को मिलेगा।

बात करें अगर 2017 के काव्यों की, तो अभी तो मैं खुद भूल गया हूं कि मैंने उस समय क्या-क्या लिखा था , लेकिन "भावश्री" ग्रंथ की शुरूवात मैं उस समय कर चुका था,  जो कि आज पूरी भी हो चुकी है!


"चल चायपाने" नामक संस्कृत कविता जनवरी २०१७ में ही लिखी थी, जो कि "काव्यश्री:" नामक ग्रंथ में मैंने रखी है।

मण्डूकमोद: मैंने जुलाई 2015 में भोपाल कैंपस कविभास्कर छात्रावास के कक्ष संख्या में लिखा था, यह "नेमावरभ्रमणम्,"  "शिवलहरी (शिवस्तुति)" , ये भी काव्यश्री में ही निहित हैं।





 भावश्री एक पत्रकाव्यसंग्रह है । इसके नाम के संबंध में भी मेरे मन में अनेक विकल्प आए ।

सबसे पहले मैं इसका नाम सोच रहा था - "पत्रकाव्यसंग्रह" , लेकिन उसके बाद में 4 नाम मैंने डिसाइड किए 2019 में - १."भावभा:" २. "भावश्री" ३. "पत्रपात्रम्" ४. "पत्रपेटिका" !

डॉक्टर अखिलेश पांडे जी से विमर्श किया इस विषय में । उन्होंने "पत्रपात्रम्" नाम पर विचार करने को कहा ! जोकि श्रीत्र्यंबकेश्वर चैतन्य स्वामी जी से पूछा, तो उन्होंने भावश्री नाम उचित बताया । असल में मुझे भी "भावश्री:" और "भावभा:" यह दो नाम ही जंच रहे थे,  इसलिए मैंने "भावश्री:"  नाम रखना उचित समझा।

फरवरी 2020 में मेरे , भावश्री, वन्द्यश्री और काव्यश्री और पितृशतकम् - ये चार काव्य प्रकाशित हो चुके हैं।



"पितृशतकम्" मैंने २०१५ के आश्विन नवरात्र में लिखा था। जिसका जिक्र मैं पहले करना भूल गया था।


"गणेशशतकम्" मैंने मार्च 2015 के लगभग ही शुरू किया था, जिसके 15 श्लोक उसी समय लिखे थे । फिर 10 श्लोक 2017 में और 20 श्लोक सन् 2019 में । अभी तक उसमें लगभग 52 श्लोक हैं , इसी महीने उसे पूरा कर दूंगा।




"कल्पनाकारशतकम्" मैंने इसी विगत नवरात्रि (२०२० चैत्र) के प्रारंभिक तीन दिनों में लिखा है।


प्रतिपदा को ५० श्लोक , द्वितीया को ५ , और तृतीया को ५२ श्लोक लिखे, इस तरह इसमें १०७ श्लोक हैं, जो लाकडाउन खुलते ही छपवा डालूंगा।

मेरी अन्य भोपाल में रहकर की गई जो काव्य रचनाएं थी , उनका भी मैं यथाकाल प्रकाशन करवाऊंगा।

***

© डॉ हिमांशु गौड़
लेखन समय और दिनांक  -०९:०० पूर्वाह्ण, ०८/०४/२०२० , गाजियाबाद।

श्रीबलरामस्तुति: संस्कृत कविता : डॉ हिमांशु गौड़

।।श्रीबलरामस्तुति:।।
*****
हे कृष्णाग्रज! शेषनागबलराट्! हे दिव्यलोकाधिप!
हे नारायणसौख्यदायिशयन! श्रीमद्गुरोस्सुप्रिय!
हे पृथ्वीधरण! प्रभो! हरिनिभाभासैस्समुद्भासित!
हे हे द्वापरमल्लयुद्धकरण! श्रीमद्धलिन् ते नमः।।१।।

हे कृष्णस्य पदं पदं प्रतिपदं साहाय्यसन्तत्पर!
हे नानासुरघातका!ऽतिभयद!न्यायप्रिया!ऽन्यायहृत्!
त्वं दुर्योधनभीमशिक्षणरतो हे विप्रगोरक्षक!
मद्बुद्धिं कुरु सत्यधर्मशरणे सङ्कर्षण!ऽऽकर्षण!!२!!


धर्मस्थापनतत्परश्शिवकरश्शम्भुप्रियश्श्रीयुतस्-
त्वं नानाविधयुद्धकौशलपरस्त्वं चासि नीलाम्बरस्-
त्वं दैन्यादिविदारकोऽतिविमलस्त्वं सर्वसम्पालकस्-
त्वं हर्यङ्ग इवैव भासि बलराट्! त्वं मेऽसि पूज्यस्सदा।।३।।

हे मेघद्युतिवस्त्रवेष्टिततनुर्हे हेममालिन्! प्रभो!
त्वम्पीताम्बरसुप्रियो मम शुभं धत्से व्रजे भ्राम्यसि
वैशम्पायन-सुप्रसन्न-वरदस्त्वं हेममाली महान्
त्वं सर्वं श्रुतिशास्त्र-तत्त्वमपि भो: भाषेस्सहस्रै: फणै:।।४।।

त्वं दिव्यश्रुति-वर्णि-तत्त्व-शरणस्त्वं यज्ञसंरक्षक:
त्वं सूर्यादि-जगत्प्रकाश-पदवी-लोकैस्समालोकित:
हे रामानुज-रूप-लक्ष्मणगुरो! त्रेतायुगे वर्तित!
हे फुङ्कार-विदग्ध-लोक! तव वै भक्तौ वयं संरता:।।५।।

*****
© डॉ. हिमांशु गौड़
०१/०२ मध्याह्ने, ०७/०४/२०२०, गाजियाबादस्थसदने।



Monday, April 6, 2020

यज्ञ क्या है, यज्ञ के कितने प्रकार हैं : विस्तृत जानकारी

यज्ञ दो प्रकार के होते है- श्रौत और स्मार्त ।

श्रुति प्रतिपादित यज्ञो को श्रौतयज्ञ और स्मृति प्रतिपादित यज्ञो को स्मार्तयज्ञ कहते हैं!
श्रौत यज्ञ में केवल श्रुति प्रतिपादित मंत्रो का प्रयोग होता है और स्मार्त यज्ञ में वैदिक पौराणिक और तांत्रिक मंन्त्रों का प्रयोग होता है।

मित्रों!
वेदों में अनेक प्रकार के यज्ञों का वर्णन मिलता है। किन्तु उनमें पांच यज्ञ ही प्रधान माने गये हैं - 1. अग्नि होत्रम्, 2. दर्शपौर्णमास, 3. चातुर्मास्य, 4. पशुयाग, 5. सोमयज्ञ, ये पाॅंच प्रकार के यज्ञ कहे गये हैं, ये सभी  श्रुति प्रतिपादित हैं! वेदों में श्रौत यज्ञों की अत्यन्त महिमा वर्णित है। श्रौत यज्ञों को श्रेष्ठतम कर्म कहा है!

कुल श्रौत यज्ञों को १९ प्रकार से विभक्त कर उनका संक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है
1. स्मार्तयज्ञः-
विवाह के अनन्तर विधिपूर्वक अग्नि का स्थापन करके जिस अग्नि में प्रातः सायं नित्य हवनादि कृत्य किये जाते हैं, उसे स्मार्ताग्नि कहते हैं! गृहस्थ को स्मार्ताग्नि में ही पका भोजन प्रतिदिन करना चाहिये।

2. श्रौताधान यज्ञः-
विधिपूर्वक दक्षिणाग्नि स्थापना को श्रौताधान कहते हैं! इसमें पितृ संबंधी कार्य होते हैं!

3. दर्शपौर्णमास यज्ञः-
अमावस्या और पूर्णिमा को होने वाले यज्ञ को दर्श और पौर्णमास कहते हैं! इस यज्ञ का अधिकार सपत्नीक होता है। इस यज्ञ का अनुष्ठान आजीवन करना चाहिए यदि कोई जीवन भर करने में असमर्थ है तो 30 वर्ष तक तो करना चाहिए।

4. चातुर्मास्य यज्ञः-
चार-चार महीने पर किये जाने वाले यज्ञ को चातुर्मास्य यज्ञ कहते हैं!

5. पशु यज्ञः-
प्रति वर्ष वर्षा ऋतु में या दक्षिणायन या उतरायण में संक्रान्ति के दिन एक बार जो पशु-याग किया जाता है, उसे निरूढ पशु-याग कहते हैं!

6. आग्रहायणेष्टि (नवान्न यज्ञ) :-
प्रति वर्ष वसन्त और शरद ऋतुओं में नवीन अन्न ( गेहूँ व चावल) से जो यज्ञ किया जाता है, उसे नवान्न कहते हैं!

7. श्रौतामणी-यज्ञ (पशुयज्ञ) :-
इन्द्र के निमित्त जो यज्ञ किया जाता है उसे श्रौतामणी यज्ञ कहते हैं!  यह इन्द्र संबन्धी पशु-यज्ञ है ! यह यज्ञ दो प्रकार का है। एक वह जो पांच दिन में पूरा होता है।
इस  श्रौतामणी यज्ञ में गोदुग्ध के साथ सुरा (मद्य) का भी प्रयोग है। किन्तु कलियुग में वर्ज्य है।
दूसरा पशुयाग कहा जाता है। क्योकि इसमें पांच अथवा तीन पशुओं की बली दी जाती है।

8. सोम यज्ञः-
सोमलता द्वारा जो यज्ञ किया जाता है उसे सोम यज्ञ कहते हैं! यह वसन्त में होता है ! यह यज्ञ एक ही दिन में पूर्ण होता है।????
 इस यज्ञ में 16 ऋत्विक ब्राह्मण होते हैं।

9. वाजपेय-यज्ञः-
इस यज्ञ के आदि और अन्त में बृहस्पति नामक सोम याग अथवा अग्निष्टोम यज्ञ होता है ! यह यज्ञ शरद रितु में होता है।

10. राजसूय यज्ञः-
राजसूय याग करने के बाद क्षत्रिय राजा  चक्रवर्ती उपाधि को धारण करता है।

11. अश्वमेघ यज्ञ:-
इस यज्ञ में दिग्विजय के लिए (घोडा) छोडा जाता है। यह यज्ञ दो वर्ष से भी अधिक समय में समाप्त होता है। इस यज्ञ का अधिकार सार्वभौम चक्रवर्ती राजा को ही होता है।

12. पुरुषमेध-यज्ञ:-
इस यज्ञ की समाप्ति चालीस दिनों में होती है। इस यज्ञ को करने के बाद यज्ञकर्ता गृह त्यागपूर्वक वान प्रस्थाश्रम में प्रवेश कर सकता है।

13. सर्वमेध यज्ञ:-
इस यज्ञ में सभी प्रकार के अन्नों और वनस्पतियों का हवन होता है। यह यज्ञ चौंतीस दिनों में समाप्त होता है।

14. एकाह यज्ञ:-
एक दिन में होने वाले यज्ञ को एकाह यज्ञ कहते हैं। इस यज्ञ में एक यजमान और सौलह विद्वान होते हैं!

स्मार्त यज्ञें---
15. रुद्र यज्ञ:-
यह तीन प्रकार का होता हैं रुद्र, महारुद्र और अतिरुद्र!

 रुद्र यज्ञ 5-7-9 दिन में होता है!
महारुद्र 9-11 दिन में होता हैं।
अतिरुद्र 9-11 दिन में होता है।

रुद्रयाग में 16 अथवा 21 विद्वान होते हैं!
महारुद्र में 31 अथवा 41 विद्वान होते हैं!
अतिरुद्र याग में 61 अथवा 71 विद्वान होते हैं!

रुद्रयाग में हवन सामग्री 11 मन, महारुद्र में 21 मन अतिरुद्र में 70 मन हवन सामग्री लगती है।

16. विष्णु यज्ञ:-
यह यज्ञ भी तीन प्रकार का होता है। विष्णुयज्ञ, महाविष्णुयज्ञ, अतिविष्णुयज्ञ!

विष्णु यज्ञ में 5-7-8 अथवा 9 दिन में होता है। महाविष्णु याग 9 दिन में औरअतिविष्णु 9 दिन में अथवा 11 दिन में होता है!
विष्णु याग में 16 महाविष्णु-याग में  41 विद्वान होते हैं। अति विष्णु याग में 61 अथवा 71 विद्वान होते है।

विष्णु याग में हवन सामग्री 11 मन ! महाविष्णु याग में 21 मन और अतिविष्णु याग में 55 मन लगती है।

17. हरिहर यज्ञ:-
हरिहर महायज्ञ में हरि (विष्णु) और हर (शिव) इन दोनों का यज्ञ होता है। हरिहर यज्ञ में 16 अथवा 21 विद्वान होते हैं!  हरिहर याग में हवन सामग्री 25 मन लगती हैं। यह महायज्ञ 9 दिन अथवा 11 दिन में होता है।

18. शिव शक्ति महायज्ञ:-
शिवशक्ति महायज्ञ में शिव और शक्ति (दुर्गा) इन दोनों का यज्ञ होता है। शिव यज्ञ प्रातः काल और शक्ति (दुर्गा) इन दोनों का यज्ञ होता है। शिव यज्ञ प्रातः काल और मध्याह्न में होता है। इस यज्ञ में हवन सामग्री 15 मन लगती है, तथा 21 विद्वान होते हैं! यह महायज्ञ 9 दिन अथवा 11 दिन में सुसम्पन्न होता है।

19. राम यज्ञ:-
राम यज्ञ विष्णु यज्ञ की तरह होता है। रामजी की आहुति होती है। रामयज्ञ में 16 अथवा 21 विद्वान होते हैं ! हवन सामग्री 15 मन लगती है। यह यज्ञ 8 दिन में होता है।

20. गणेश यज्ञ:-
गणेश यज्ञ में एक लाख (100000) आहुति होती है। 16 अथवा 21 विद्वान होते है। गणेशयज्ञ में हवन सामग्री 21 मन लगती है। यह यज्ञ 8 दिन में होता है।

21. ब्रह्म यज्ञ (प्रजापति यज्ञ):-
प्रजापत्ति याग में एक लाख (100000) आहुति होती हैं इसमें 16 अथवा 21 विद्वान होते है। प्रजापति यज्ञ में 12 मन सामग्री लगती है। 8 दिन में होता है।

22. सूर्य यज्ञ:-
सूर्य यज्ञ में एक करोड़ 10000000 आहुति होती है। 16 अथवा 21 विद्वान होते है। सूर्य यज्ञ  21 दिन में किया जाता है। इस यज्ञ में 120 मन हवन सामग्री लगती है।

23. दूर्गा यज्ञ:-
दूर्गा यज्ञ में दूर्गासप्तशती से हवन होता है। दूर्गा यज्ञ में हवन करने वाले 4 विद्वान होते हैं! अथवा 16 या 21 विद्वान होते है। यह यज्ञ 9 दिन का होता है। हवन सामग्री 10 मन अथवा 15 मन लगती है।

24. लक्ष्मी यज्ञ:-
लक्ष्मी यज्ञ में श्री सुक्त से हवन होता है। लक्ष्मी यज्ञ (100000) एक लाख आहुति होती हैं! इस यज्ञ में 11 अथवा 16 विद्वान होते हैं! अथवा 21 विद्वान होते हैं यह 8 दिन में किया जाता है। 15 मन हवन सामग्री लगती है।

25. लक्ष्मी नारायण महायज्ञ:-
लक्ष्मी नारायण महायज्ञ में लक्ष्मी और नारायण का हवन होता हैं ! प्रात लक्ष्मी व दोपहर में  नारायण का यज्ञ होता है। एक लाख 8 हजार अथवा 1 लाख 25 हजार आहुतियां होती है।
30 मन हवन सामग्री लगती है। 31 विद्वान होते हैं। यह यज्ञ 8 दिन 9 दिन अथवा 11 दिन में पूरा होता है।

26. नवग्रह महायज्ञ:-
नवग्रह महायज्ञ में नवग्रह और नवग्रह के अधिदेवता तथा प्रत्याधिदेवता के निमित्त आहुति होती हैं !
नवग्रह~ महायज्ञ में एक करोड़ आहुति अथवा एक लाख अथवा दस हजार आहुति होती है। 31, 41 विद्वान होते है। हवन सामग्री 11 मन लगती है। कोटिमात्मक नव ग्रह महायज्ञ में हवन सामग्री अधिक लगती हैं यह यज्ञ ९ दिन में होता हैं इसमें 1,5,9 और 100 कुण्ड होते है। नवग्रह महायज्ञ में नवग्रह के आकार के 9 कुण्डों के बनाने का अधिकार है।

27. विश्वशांति महायज्ञ:-
विश्वशांति महायज्ञ में शुक्लयजुर्वेद के 36 वे अध्याय के सम्पूर्ण मंत्रों से आहुति होती है। विश्वशांति महायज्ञ में सवा लाख (123000) आहुति होती हैं इस में 21 अथवा 31 विद्वान होते है। इसमें हवन सामग्री 15 मन लगती है। यह यज्ञ 9 दिन अथवा 4 दिन में होता है।

28. पर्जन्य यज्ञ (इन्द्र यज्ञ):-
पर्जन्य यज्ञ (इन्द्र यज्ञ) वर्षा के लिए किया जाता है। इन्द्र यज्ञ में तीन लाख बीस हजार (320000) आहुति होती हैं अथवा एक लाख 60 हजार (160000) आहुति होती है। 31 मन हवन सामग्री लगती है। इस में 31 विद्वान हवन करने वाले होते है। इन्द्रयाग 11 दिन में सुसम्पन्न होता है।

29. अतिवृष्टि रोकने के लिए यज्ञ:-
अनेक गुप्त मंत्रों से जल में 108 वार आहुति देने से घोर वर्षा बन्द हो जाती है।

30. गोयज्ञ:-
वेदादि शास्त्रों में गोयज्ञ लिखे है। वैदिक काल में बडे-बडे़ गोयज्ञ हुआ करते थे। भगवान श्री कृष्ण ने भी गोवर्धन पूजन के समय गौयज्ञ कराया था। गोयज्ञ में वे वेदोक्त गोसूक्तों से गोरक्षार्थ हवन , गौ पूजन , वृषभ पूजन आदि कार्य किये जाते हैं! जिससे गौसंरक्षण , गौ-संवर्धन, गौवंश-रक्षण, गौवंश-वर्धन गौ-महत्व प्रख्यापन और गौ-सड्गतिकरण आदि में लाभ मिलता हैं ! गौयज्ञ में ऋग्वेद के मंत्रों द्वारा हवन होता है। इस में सवा लाख अथवा  250000 आहुति होती हैं ! गौयाग में हवन करने वाले 21 विद्वान होते है। यह यज्ञ 8 अथवा 9 दिन में सुसम्पन्न होता है।

तीन संस्कृत कविताएं : हिमांशु गौड़














chi è il poeta sanscrito Himanshu Gaur







 Dr. Himanshu Gaur è un noto poeta sanscrito.  È nato in un villaggio chiamato Bahadurgarh sotto il distretto di Hapur nell'Uttar Pradesh.


 La sua educazione ebbe luogo in un luogo chiamato Narwar della città di Narora, nel distretto di Bulandshahar, nell'Uttar Pradesh.  Il suo nome Guruji è Shree Shyamsunder Sharma aka Baba Guru Ji.

 Shastri (BA) e Acharya (MA), diplomati in sanscrito grammatica, ha conseguito presso lo Shri Raghunath Adarsh ​​Sanskrit College di Chandausi, imparentato con l'Università Sampurnan e sanscrita, e nel 2011-2012 ha venduto il National Institute of Sanskrit, Central  Università, Nuova Delhi.  Ha anche ricevuto il grado di educatore presso il campus di K Bhopal.  Successivamente, nel 2015, si è unito al Bhopal Campus del National Sanskrit Institute per fare il suo dottorato di ricerca, che ha svolto attività di ricerca per tre anni consecutivi nell'ostello Bhaskar.
 Il suo lavoro di ricerca riguardava il capitolo Swarprakasya della teoria di Kaumudi Granth sotto la grammatica.  Il Dr. Kailash Chandra Das è stato il suo genio per questo lavoro di ricerca.

 Il Dr. Himanshu Gaur era ricco sin dall'inizio ed era fedele alle Scritture.
 Sembra che molte scritture siano state automaticamente memorizzate dai riti della nascita precedente.
 Acharya Himanshu era una ragazza con un forte interesse per la poesia in sanscrito, anche se ha scritto molte qualifiche inedite, ma dal 2014 ha iniziato a scrivere poesie regolarmente.  Finora sono stati pubblicati cinque testi in sanscrito di Acharya Himanshu Bol.

 "Sribabagurushatakam", che ha scritto sul personaggio della vita del suo guru, è un libro molto emozionante e virtuoso.

 Il libro è stato pubblicato dalla True Humanity Foundation a novembre 2019.
 Questo è il primo libro di poesie pubblicato dal Dr. Himanshu Gaur, in questo libro è stato anche trattato un trattato in hindi in modo che anche la gente comune possa capirlo.

 Successivamente, nel febbraio 2020, Bhavashri del Dr. Himanshu Gaur, Vandyashree, Kavashree e Pitrishtakam -
 Questi altri quattro libri di poesie sanscrite sono stati pubblicati.

 Il Dr. Himanshu Gaur è impegnato al servizio di Madre Saraswati giorno e notte ed è pronto a comporre molti tipi di poesie.
 Le sue composizioni poetiche sembrano essere molto emotive e vaganti nel suo strano mondo.

 La visione unica e sottile del Dr. Himanshu Gaur di vedere qualsiasi evento, scena, situazione è molto diversa e fondamentale, il che lo rende un poeta speciale.

 C'è molta semplicità nella sua poesia, ma spesso le sue poesie sono molto classiche e hanno un approccio specifico.

 Occasionalmente, la performance di uno stile armonioso si trova nella sua poesia.  A volte le sofferenze della vita compaiono nella sua poesia, poi da qualche parte i flussi di devozione scorrono nella sua poesia!
 Da qualche parte l'importanza del sapere, da qualche parte la discussione mitologica, da qualche parte una descrizione della scena cosmica e da qualche parte attività mentali e sentite sono presentate dal Dr. Himanshu Gaur con grande efficienza.  Le sue prossime poesie saranno presto pubblicate -

 Divyandarashtakam
 ******
 Questo libro, composto dal Dr. Himanshu Gaur, è una poesia per mostrare la sua immaginazione.  Divyandhar è un personaggio immaginario.  È un uomo dalle qualità incredibili.  Conosce le arti marziali, il nuoto, le arti del linguaggio e le arti ipnotiche.  È molto coraggioso e ha un'immaginazione meravigliosa.  Conosce anche Tantra e Yajna.  Le proprietà delle stesse sono descritte in questo secolo.  Il poeta ha descritto molte caratteristiche di questo personaggio immaginario in 100 versi.  Ci sono molti rasa, versi e ornamenti in questa poesia.

 ****



 Secolo fantasioso
 *****
 Nella poesia presentata, il poeta ha mostrato il suo talento poetico fondamentalmente guardando le immagini dell '"immaginatore" e vedendo il suo amore per la natura, riflettendo sulla sua immaginazione e incorporando le scritture in essa.  L'immaginazione del poeta è così grande che ha creato questo libro solo dopo aver visto le immagini del personaggio centenario "Immaginario".  Sebbene il personaggio di questo libro sia anche una persona che si presenta con un pensiero e un fatto speciali, un amante della natura e una persona riflessiva e fantasiosa, ma guardando quei pensieri e le immagini che sono venute alla mente del poeta, e  dal suo talento Questo sentimento è creato, con il quale è composto da 100 versi.  Ha molti rasa, versi e ornamenti.
 *******

 Shriganesh secolo
 *******
 Ringraziando Lord Ganesha, questa poesia di cento versi è dotata del talento originale del poeta.  In questa poesia, il poeta ha parlato a Lord Ganesha.  Lord Ganesha è raffigurato in molti modi.  Il poeta ha composto questa poesia con i suoi sinceri sentimenti e lo stile devozionale classico.  Elogio di Lord Ganesha è il principale in questo poema.  Ci sono molti elementi letterari in questa poesia.
 ***


 Sun secolo
 *******
 Questa poesia è una poesia di 100 versi pieni del talento fondamentale del poeta, scritto in relazione al Dio Sole.  Vandana di Lord Surya è importante in questo.  E il poeta ha espresso i suoi molti sentimenti sinceri nei confronti di Lord Surya.  Il pensiero specifico e la riverenza del poeta per il Sole sono particolarmente visibili in questa poesia.  Parlare con il Sole e varie forme del Sole si trovano in questa poesia.
 *****

 Amico secolo
 ****
 In questa poesia, il poeta ha esposto il suo pensiero originale sull'amico!  Molte forme di amicizia, molti tipi sono stati descritti in esso.  La forma ideale e la cattiva forma di amicizia sono anche menzionate in essa.  Chi è un amico, chi è un nemico come amico - questo è raccontato anche attraverso la poesia.  A proposito, in questa poesia piena dei sentimenti sinceri e belli dell'amicizia, principalmente un ideale e un amico piacevole è stato descritto come il migliore e lo ha rappresentato.  Ci sono molti rasa, versi e ornamenti in questa poesia.
 *****


 Shrimat Tryambakeshwar chaitanya panchashati
 ****
 Le opinioni personali del poeta in relazione alle opinioni di Shri Trimbakeshwar Chaitanya Swamy in una foto pubblicata su Facebook di vari luoghi, hanno un'origine personale, è descritto in questo versetto in 50 versi.  In questo modo è anche una poesia ritratto.  In questa poesia sono state presentate molte scene, eventi e fatti, questa è una poesia completamente originale.  Ha molti versi e ornamenti rasa.
 ***

Friday, April 3, 2020

दान देने और पूजा पाठ करने में कुछ सावधानियां : आचार्य हिमांशु गौड़


१.दान हमेशा पात्र को देना चाहिए (मतलब जो दान में दिए हुए धन आदि का दुरुपयोग ना करें और शास्त्र विहित कर्म से युक्त हो)।


२.दान बहुत ही नम्रता पूर्वक देना चाहिए, अभिमान पूर्वक या अपमान करके दिया हुआ दान बहुत ही निष्फल एवं पाप-पूर्ण हो जाता है !



३.अपने दिए हुए दान का कभी भी बखान नहीं करना चाहिए , क्योंकि अपने किए हुए सत्कर्म को कहने मात्र से ही उसका फल नष्ट हो जाता है ।


४.अपनी भजन-पूजा ज्यादा लोगों को बताना नहीं चाहिए या दिखाना नहीं चाहिए, क्योंकि उससे अपने तपस्वी होने का अभिमान जगता है , और अपने जप-तप को किसी से बताने से भी उसका पुण्य फल नष्ट होता है।


५. जहां तक संभव हो पूजा-पाठ शास्त्र की विधि के अनुसार ही करना चाहिए क्योंकि जो शास्त्र की विधि को छोड़ता है और मनमानी पूजा करता है उसको कोई फल प्राप्त नहीं होता।


६. जो भी कहता है कि श्रद्धा होनी चाहिए विधि विधान का क्या है, तो वे लोग गीता के श्लोक को याद रखें कि श्रद्धा विश्वास तो है ही , साथ में विधि-विधान भी होना चाहिए (यश्शास्त्रविधिमुत्सृज्य....) ।

****
आचार्य हिमांशु गौड़



मनुस्मृति में मांस खाने का निषेध : डॉ हिमांशु गौड़


******
यावन्ति पशुरोमाणि तावत्कृत्वो ह मारणम् ।
 वृथापशुघ्नः प्राप्नोति प्रेत्य जन्मनि जन्मनि ॥
********
एक पशु की हत्या करने पर,
जानवर के शरीर में जितने रोएं होते हैं, उतने जन्म तक वह मारने वाला पशु बनता है।
*********
 नाकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्पद्यते क्वचित्।
न च प्राणिवधः स्वर्ग्यस्तस्मान्मांसं विवर्ज्जयेत् ॥
*********
प्राणी को मारे बिना मांस नहीं प्राप्त होता, और प्राणी हत्या कभी भी स्वर्ग देने वाली नहीं, इसलिए मांस कभी भी नहीं खाना चाहिए।
********
 समुत्पत्तिञ्च मांसस्य वधबन्धौ च देहिनाम् ।
 प्रसमीक्ष्य निवर्त्तेत सर्व्वमांसस्य भक्षणात् ॥

*****
इसलिए जो नरक में नहीं जाना चाहते, जो पशु योनि में नहीं जाना चाहते वे लोग बिल्कुल भी मांस न खाएं।
*******
 मनुस्मृति/पंचम अध्याय